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Shubham Verma

Shubham Verma

Development Associate | VIF

महाभारत की द्रोपदी – पश्चिमी नारीवाद की शिकार

पश्चिमी नारीवादियो तथा वामपंथियों का यह तर्क की द्रोपदी एक अबला नारी थी तथा वह भारत और हिन्दू धर्म की पित्रसत्तात्मक सोच का शिकार हुई थी | यह सरासर गलत तर्क है तथा इनके अधूरे और अज्ञान का परिचायक है |

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Draupadi mahabharata pandavas द्रोपदी हिन्दू धर्म

द्रोपदी – यह शब्द सुनते ही एक अचानक दिमाग में पहली छवि उस औरत की बनती है जिसके पाँच पति थे तथा जिसकी साड़ी भरी सभा में कौरवों द्वारा खीची गयी थी | यह शायद इसलिए क्योंकि ऐंसा ही कुछ दृश्य कई बार टीवी पर चल रही कई महाभारतों में दिखाया गया है तथा कई पुस्तकों की कवर फोटो में द्रोपदी के चीरहरण को जगह दी गयी है | यही नहीं कई प्रसिद्द चित्रकारों ने भी इस विषय पर बनाई गयी कई तस्वीरों में द्रोपदी के चीर का हजारों बार हरण किया है |

पहले मै भी औरों की तरह ही साधारण नज़रिए से इसे देखता था तथा यही सोचता था की ठीक है महाभारत के एक हिस्से का चित्रण लोगों ने किया है | पर धीरे धीरे जब अंग्रेजी दस्तावेजो और वामपंथी साहित्य का अध्ययन अधिक किया तब कुछ बुद्धि की परतें अचानक खुलती चली गयीं तथा यह ज्ञात हुआ की महाभारत की द्रोपदी, महिषासुर मर्दिनी दुर्गा या रामायण की सीता को ही पश्चिमी नारीवादियो, मिशनरियों तथा वामपंथियों ने क्यों चुना तथा इसके पीछे इनका प्रयोजन कितना बड़ा है | इसी प्रयोजन को इस लेख के माध्यम से आसान भाषा में मैंने लोगों के समक्ष रखने का निर्णय लिया है |

सबसे पहले तो महाभारत के उस दृश्य के विषय मे जानते हैं जिसमे चीरहरण की घटना हुई थी तथा जिसपर यह लेख आधारित है –

“जब युधिष्ठिर जुए मे राज-पाट तथा भाइयों सहित स्वयं को भी हार जाने पर उठने लगे तो शकुनि ने कहा, “युधिष्ठिर! अभी भी तुम अपना सब कुछ वापस जीत सकते हो। अभी द्रौपदी तुम्हारे पास दाँव में लगाने के लिये शेष है। यदि तुम द्रौपदी को दाँव में लगा कर जीत गये तो मैं तुम्हारा हारा हुआ सब कुछ तुम्हें लौटा दूँगा।” सभी तरह से निराश युधिष्ठिर ने अब द्रौपदी को भी दाँव में लगा दिया और हमेशा की तरह हार गये।

अपनी इस विजय को देख कर दुर्योधन पागल हो उठा और विदुर से बोला, “द्रौपदी अब हमारी दासी है, आप उसे तत्काल यहाँ ले आइये।”

दुर्योधन के वचन सुन कर विदुर तिलमिला कर बोले, “दुष्ट! धर्मराज युधिष्ठिर की पत्नी दासी बने, ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता। ऐसा प्रतीत होता है कि तेरा काल निकट है इसीलिये तेरे मुख से ऐसे वचन निकल रहे हैं।” परन्तु दुष्ट दुर्योधन ने विदुर की बातों की ओर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और द्रौपदी को सभा में लाने के लिये अपने एक सेवक को भेजा। वह सेवक द्रौपदी के महल में जाकर बोला, “महारानी! धर्मराज युधिष्ठिर कौरवों से जुआ खेलते हुये सब कुछ हार गये हैं। वे अपने भाइयों को भी आपके सहित हार चुके हैं, इस कारण दुर्योधन ने तत्काल आपको सभा भवन में बुलवाया है।” द्रौपदी ने कहा, “सेवक! तुम जाकर सभा भवन में उपस्थित गुरुजनों से पूछो कि ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिये?” सेवक ने लौट कर सभा में द्रौपदी के प्रश्न को रख दिया। उस प्रश्न को सुन कर भीष्म, द्रोण आदि वृद्ध एवं गुरुजन सिर झुकाये मौन बैठे रहे।

यह देख कर दुर्योधन ने दुःशासन को आज्ञा दी, “दुःशासन! तुम जाकर द्रौपदी को यहाँ ले आओ।” दुर्योधन की आज्ञा पाकर दुःशासन द्रौपदी के पास पहुँचा और बोला, “द्रौपदी! तुम्हें हमारे महाराज दुर्योधन ने जुए में जीत लिया है। मैं उनकी आज्ञा से तुम्हें बुलाने आया हूँ।” यह सुन कर द्रौपदी ने धीरे से कहा, “दुःशासन! मैं रजस्वला हूँ, सभा में जाने योग्य नहीं हूँ क्योंकि इस समय मेरे शरीर पर एक ही वस्त्र है।” दुःशासन बोला, “तुम रजस्वला हो या वस्त्रहीन, मुझे इससे कोई प्रयोजन नहीं है। तुम्हें महाराज दुर्योधन की आज्ञा का पालन करना ही होगा।” उसके वचनों को सुन कर द्रौपदी स्वयं को वचाने के लिये गांधारी के महल की ओर भागने लगी, किन्तु दुःशासन ने झपट कर उसके घुँघराले केशों को पकड़ लिया और सभा भवन की ओर घसीटने लगा। सभा भवन तक पहुँचते-पहुँचते द्रौपदी के सारे केश बिखर गये और उसके आधे शरीर से वस्त्र भी हट गये। अपनी यह दुर्दशा देख कर द्रौपदी ने क्रोध में भर कर उच्च स्वरों में कहा, “रे दुष्ट! सभा में बैठे हुये इन प्रतिष्ठित गुरुजनों की लज्जा तो कर। एक अबला नारी के ऊपर यह अत्याचार करते हुये तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आती? धिक्कार है तुझ पर और तेरे भरतवंश पर!”

यह सब सुन कर भी दुर्योधन ने द्रौपदी को दासी कह कर सम्बोधित किया। द्रौपदी पुनः बोली, “क्या वयोवृद्ध भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, विदुर इस अत्याचार को देख नहीं रहे हैं? कहाँ हैं मेरे बलवान पति? उनके समक्ष एक गीदड़ मुझे अपमानित कर रहा है।” द्रौपदी के वचनों से पाण्डवों को अत्यन्त क्लेश हुआ किन्तु वे मौन भाव से सिर नीचा किये हुये बैठे रहे। द्रौपदी फिर बोली, “सभासदों! मैं आपसे पूछना चाहती हूँ कि धर्मराज को मुझे दाँव पर लगाने का क्या अधिकार था?” द्रौपदी की बात सुन कर विकर्ण उठ कर कहने लगा, “देवी द्रौपदी का कथन सत्य है।” युधिष्ठिर को अपने भाई और स्वयं के हार जाने के पश्चात् द्रौपदी को दाँव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि वह पाँचों भाई की पत्नी है अकेले युधिष्ठिर की नहीं। और फिर युधिष्ठिर ने शकुनि के उकसाने पर द्रौपदी को दाँव पर लगाया था, स्वेच्छा से नहीं। अतएव कौरवों को द्रौपदी को दासी कहने का कोई अधिकार नहीं है।”

विकर्ण के नीतियुक्त वचनों को सुनकर दुर्योधन के परम मित्र कर्ण ने कहा, “विकर्ण! तुम अभी कल के बालक हो। यहाँ उपस्थित भीष्म, द्रोण, विदुर, धृतराष्ट्र जैसे गुरुजन भी कुछ नहीं कह पाये, क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि द्रौपदी को हमने दाँव में जीता है। क्या तुम इन सब से भी अधिक ज्ञानी हो? स्मरण रखो कि गुरुजनों के समक्ष तुम्हें कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है।” कर्ण की बातों से उत्साहित होकर दुर्योधन ने दुःशासन से कहा, “दुःशासन! तुम द्रौपदी के वस्त्र उतार कर उसे निर्वसना करो।” इतना सुनते ही दुःशासन ने द्रौपदी की साड़ी को खींचना आरम्भ कर दिया। द्रौपदी अपनी पूरी शक्ति से अपनी साड़ी को खिंचने से बचाती हुई वहाँ पर उपस्थित जनों से विनती करने लगी, “आप लोगों के समक्ष मुझे निर्वसन किया जा रहा है किन्तु मुझे इस संकट से उबारने वाला कोई नहीं है। धिक्कार है आप लोगों के कुल और आत्मबल को। मेरे पति जो मेरी इस दुर्दशा को देख कर भी चुप हैं उन्हें भी धिक्कार है।”

द्रौपदी की दुर्दशा देख कर विदुर से रहा न गया, वे बोल उठे, “दादा भीष्म! एक निरीह अबला पर इस तरह अत्याचार हो रहा है और आप उसे देख कर भी चुप हैं। क्या हुआ आपके तपोबल को? इस समय दुरात्मा धृतराष्ट्र भी चुप है। वह जानता नहीं कि इस अबला पर होने वाला अत्याचार उसके कुल का नाश कर देगा। एक सीता के अपमान से रावण का समस्त कुल नष्ट हो गया था।”

विदुर ने जब देखा कि उनके नीतियुक्त वचनों का किसी पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो वे सबको धिक्कारते हुये वहाँ से उठ कर चले गये।

दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र को खींचने के अपने प्रयास में लगा ही हुआ था। द्रौपदी ने जब वहाँ उपस्थित सभासदों को मौन देखा तो वह द्वारिकावासी श्री कृष्ण को टेरती हुई बोली, “हे गोविन्द! हे मुरारे! हे कृष्ण! मुझे इस संसार में अब तुम्हारे अतिरिक्त और कोई मेरी लाज बचाने वाला दृष्टिगत नहीं हो रहा है। अब तुम्हीं इस कृष्णा की लाज रखो।”

भक्तवत्सल श्री कृष्ण ने द्रौपदी की पुकार सुन ली। वे समस्त कार्य त्याग कर तत्काल अदृश्यरूप में वहाँ पधारे और आकाश में स्थिर होकर द्रौपदी की साड़ी को बढ़ाने लगे। दुःशासन द्रौपदी की साड़ी को खींचते जाता था और साड़ी थी कि समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती थी। साड़ी को खींचते-खीचते दुःशासन शिथिल होकर पसीने-पसीने हो गया किन्तु अपने कार्य में सफल न हो सका। अन्त में लज्जित होकर उस चुपचाप बैठ जाना पड़ा। अब साड़ी के उस पर्वत के समान ऊँचे ढेर को देख कर वहाँ बैठे समस्त सभाजन द्रौपदी के पातिव्रत की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करने लगे और दुःशासन को धिक्कारने लगे। द्रौपदी के इस अपमान को देख कर भीमसेन का सारा शरीर क्रोध से जला जा रहा था। उन्होंने घोषणा की, “जिस दुष्ट के हाथों ने द्रौपदी के केश खींचे हैं, यदि मैं उन हाथों को अपनी गदा से नष्ट न कर दूँ तो मुझे सद्गति ही न मिले। यदि मैं उसकी छाती को चीर कर उसका रक्तपान न कर सकूँ तो मैं कोटि जन्मों तक नरक की वेदना भुगतता रहूँ। मैं अपने भ्राता धर्मराज युधिष्ठिर के वश में हूँ अन्यथा इस समस्त कौरवों को मच्छर की भाँति मसल कर नष्ट कर दूँ। यदि आज मै स्वामी होता तो द्रौपदी को स्पर्श करने वाले को तत्काल यमलोक पहुँचा देता।”

भीमसेन के वचनों को सुन कर भी अन्य पाण्डवों तथा सभासदों को मौन देख कर दुर्योधन और अधिक उत्साहित होकर बोला, “द्रौपदी! मैं तुम्हें अपनी महारानी बना रहा हूँ। आओ, तुम मेरी बाँयीं जंघा पर बैठ जाओ। इन पुंसत्वहीन पाण्डवों का साथ छोड़ दो।” यह सुनते ही भीम अपनी दुर्योधन के साथ युद्ध करने के लिये उठ खड़े हुये, किन्तु अर्जुन ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें रोक लिया। इस पर भीम पुनः दुर्योधन से बोले, “दुरात्मा! मैं भरी सभा में शपथ ले कर कहता हूँ कि युद्ध में तेरी जाँघ को चीर कर न रख दूँ तो मेरा नाम भीम नहीं।”

इसी समय सभा में भयंकर अपशकुन होता दिखाई पड़ा। गीदड़-कुत्तों के रुदन से पूरा वातावरण भर उठा। इस उत्पात को देखकर धृतराष्ट्र और अधिक मौन न रह सके और बोले उठे, “दुर्योधन! तू दुर्बुद्धि हो गया है। आखिर कुछ भी हो, द्रौपदी मेरी पुत्र वधू है। उसे तू भरी सभा में निर्वसना कर रहा है।” इसके पश्चात् उन्होंने द्रौपदी से कहा, “पुत्री! तुम सचमुच पतिव्रता हो। तुम इस समय मुझसे जो वर चाहो माँग सकती हो।” द्रौपदी बोलीं, “यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे यह वर दें कि मेरे पति दासता से मुक्ति पा जायें।” धृतराष्ट्र ने कहा, “देवि! मैं तुम्हें यह वर दे रहा हूँ। पाण्डवगण अब दासता मुक्त हैं। पुत्री! तुम कुछ और माँगना चाहो तो वह भी माँग लो।” इस पर द्रौपदी ने कहा, “हे तात! आप मेरे पतियों के दिव्य रथ एवं शस्त्रास्त्र लौटा दें।” धृतराष्ट्र ने कहा, “तथास्तु”। पाण्डवों के दिव्य रथ तथा अस्त्र-शस्त्र लौटा दिये गये। धृतराष्ट्र ने कहा, “पुत्री! कुछ और माँगो।” इस पर द्रौपदी बोली, “बस तात्! क्षत्राणी केवल दो वर ही माँग सकती है। इससे अधिक माँगना लोभ माना जायेगा। तीसरा वर मांगने के लिए वह तैयार ही नहीं हुई, क्योंकि उसके अनुसार क्षत्रिय स्त्रियाँ दो वर मांगने की ही अधिकारिणी होती हैं।

धृतराष्ट्र ने उनसे संपूर्ण विगत को भूलकर अपना स्नेह बनाए रखने के लिए कहा। साथ ही उन्हें खांडव वन में जाकर अपना राज्य भोगने की अनुमति दी। धृतराष्ट्र ने उनके खांडव वन जाने से पूर्व, दुर्योधन की प्रेरणा से, उन्हें एक बार फिर से जुआ खेलने की आज्ञा दी। यह तय हुआ कि एक ही दाँव रखा जायेगा। पांडव अथवा धृतराष्ट्र पुत्रों में से जो भी हार जायेंगे, वे मृगचर्म धारण कर बारह वर्ष वनवास करेंगे और एक वर्ष अज्ञातवास में रहेंगे। उस एक वर्ष में यदि उन्हें पहचान लिया गया तो फिर से बारह वर्ष का वनवास ग्रहण करेंगे।

भीष्म, विदुर, द्रोणाचार्य आदि के रोकने पर भी द्यूतक्रीड़ा हुई, जिसमें पांडव हार गये। शकुनि द्वारा कपटपूर्वक खेलने से कौरव विजयी हुए। वनगमन से पूर्व पांडवों ने शपथ ली कि वे समस्त शत्रुओं का नाश करके ही चैन की सांस लेंगे।”

महाभारत के चीर हरण का यह द्रष्टांत महाभारत ग्रंथ का एक बहुत आवश्यक अध्याय है | जिसमे कुछ आसुरीक प्रवृत्ति के कौरवों ने द्रोपदी को अपमानित किया वहीं एक कौरव विकर्ण ने इसका विरोध किया | इस वृतांत मे जहाँ पांडव तथा भीष्म इत्यादि शांत रहे वहीं कर्ण जैसे दानवीर अधर्म के पक्ष मे बोल गए तथा विदुर ने कौरवो की सेना मे होने पर भी अधर्म का विरोध किया | अंत मे श्री कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई तथा कालांतर मे महाभारत के अंत मे जिस जिस ने द्रोपदी के साथ अन्याय किया तथा जो जो अन्यायी सेना के साथ लड़े उन सभी का अंत हुआ यह सभी लोग भली भांति जानते हैं |

मुझे दुःख तब हुआ जब भारत के एक सामाजिक विज्ञान के बड़े नामी कॉलेज में पढने वाली जर्मनी से आई छात्रा ने मुझसे कहा की – “तुम्हारे देश में तो सदियों से नारियों पर अत्याचार होते आये हैं तथा इसका मूल कारण हिन्दू धर्म है क्योंकि हिन्दू धर्म शुरू से नारियों पर अत्याचार करना सिखाता है |”

मैंने कहा की यदि तुम यह कहती की व्यक्तिगत रूप से कुछ लोग नारियों पर अत्याचार करते हैं तो मै फिर भी मान लेता पर किस आधार पर तुम मेरे देश तथा धर्म पर इस तरह के आरोप लगा रही हो ? इसपर उसने कहा की इसी देश के सामाजिक विज्ञान के एक विषय नारी सशक्तिकरण में उसे यह सब पढाया गया तथा भारत के ही शिक्षको ने उसे यह बताया की भारत में नारियों पर अत्याचार होता था तथा इसका मूल कारण हिन्दू धर्म है|

मेरे पूछने पर की इसका कारण हिन्दू धर्म कैंसे है उसने कहा की – “तुम्हारे धर्म ग्रंथ महाभारत में हिन्दू राजा द्रोपदी की साडी भरी सभा में खीचते हैं तथा समस्त सभा देखती रहती है | वह बेचारी अबला नारी यह सब सहन करती है | यह भारत की और हिन्दू धर्म की पित्रसत्तात्मक सोच के कारण हुआ था, जो अब भी जारी है तथा इसीलिए भारत में बलात्कार हो रहे हैं |”

मै जानता था की ना वो लड़की संस्कृत जानती है ना ही उसने महाभारत पढ़ी है | मुझे भारत के सामाजिक विज्ञान के विश्वविध्यालयो तथा उनमें बैठे कुछ देश विरोधी शिक्षको के विषय में भी जानकारी थी जिन्होंने उस विदेशी लड़की के मन में भारत तथा हिन्दू धर्म के प्रति घृणा का यह भाव जगाया था | मै चाहता तो दूसरों की तरह उस जर्मन लड़की को इसाई पादरियों द्वारा दुनियाभर में किये जा रहे बलात्कार, यूरोप की विच हंटिंग, यूरोप-अमेरिका में महिलाओं को देर से मिले वोटिंग राईट एवं बैंक अकाउंट की सुविधा इत्यादि से लेकर प्लेटो के कथन – “महिलाओं में आत्मा नहीं होती” इत्यादि की याद दिला सकता था मगर सवाल मेरे धर्म ग्रन्थ पर उठा था अतः जवाब मेरे ग्रन्थ से आना था | इसलिए मैंने वापस जाकर गीता प्रेस की वेदव्यास जी वाली महाभारत का अध्ययन किया तथा उसमे से जो तथ्य सामने आये उसी के आधार पर मैंने उसे यह बताया की महाभारत में ऐसा क्यों हुआ था ? तथा क्यों ! द्रोपदी अबला नारी नहीं थी ?

मूल ग्रन्थ महाभारत की कथा से आप सभी को मै यह बताता हूँ की असली कहानी क्या है ? ज्यादातर लोग कहानी की शुरुआत कौरवों और पांडवों से करते हैं किन्तु महाभारत में हर पात्र के इतिहास से लेकर भविष्य तक पूरा वर्णन है | खासकर के उन पात्रो का जिनका महाभारत में अहम् किरदार है | तो द्रोपदी के विषय में सत्य निकालना कोई बड़ी बात नहीं है | पर इसपर बात करने से पहले मै यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मै स्वयं महाभारत को धर्म ग्रन्थ नहीं बल्कि भारत का इतिहास मानता हूँ इसलिए यह धर्मग्रन्थ है ऐंसा मानना वामपंथियों तथा अंग्रेजों का भ्रम है | यदि कोई इसे मेरी तरह इतिहास नहीं भी मानता तथा सिर्फ एक कथा भी मानता है तो भी इसी कथा में द्रोपदी पर उठ रहे सवालों के जवाबो का वर्णन है |

‘द्रोपदी’ के विषय में जानने के लिए पहले आपको महाभारत की कथा को और पहले से पढना होगा | इस घटनाक्रम का अध्याय शुरू होता है “द्रोणाचार्य” से जो ऋषि भरद्वाज के पुत्र थे तथा पिता के आश्रम में ही रहते हुये वे चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो गये थे । द्रोण के साथ प्रषत् नामक राजा के पुत्र “द्रुपद” भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तथा दोनों में प्रगाढ़ मैत्री हो गई। द्रुपद तथा द्रोण इतने अच्छे मित्र हो गए की गुरुकुल में द्रुपद ने द्रोण से यहाँ तक कह दिया की- “यदि मै राजा बनता हूँ तो मेरा आधा राज्य तुम्हे सौंप दूंगा|”

इसके बाद दोनों की शिक्षा पूर्ण होने पर दोनों अपने काम में लग गए | “द्रुपद” अपने राज्य के सच में राजा बन गए | उन्हीं दिनों परशुराम अपनी समस्त सम्पत्ति को ब्राह्मणों में दान कर के महेन्द्राचल पर्वत पर तप कर रहे थे। एक बार द्रोण उनके पास पहुँचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया। इस पर परशुराम बोले, “वत्स! तुम विलम्ब से आये हो, मैंने तो अपना सब कुछ पहले से ही ब्राह्मणों को दान में दे डाला है। अब मेरे पास केवल अस्त्र-शस्त्र ही शेष बचे हैं। तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो।” द्रोण यही तो चाहते थे अतः उन्होंने कहा, “हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर के मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी, किन्तु आप को मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा-दीक्षा देनी होगी तथा विधि-विधान भी बताना होगा।” इस प्रकार परशुराम के शिष्य बन कर द्रोण अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये ।

शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात द्रोण का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हो गया। कृपी से उनका एक पुत्र हुआ। यह महाभारत का वह महत्त्वपूर्ण पात्र बना जिसका नाम अश्वसथामा था। । द्रोणाचार्य का प्रारंभिक जीवन अत्यंत गरीबी में कट रहा था तथा भोजन की व्यवस्था भी बहुत कठिनाई से हो पाती थी | पत्नी तथा पुत्र को पालना भी मुश्किल हो रहा था | ऐसे समय में द्रोण को अपने बचपन के मित्र द्रुपद की याद आई तथा उन्हें यह बात भी याद आई जो उनके मित्र द्रुपद ने आश्रम में उनसे कही थी की “यदि मै राजा बनता हूँ तो मेरा आधा राज्य तुम्हे सौंप दूंगा|” तब द्रोण ने सोचा की आधा राज्य भले ही ना मिले पर कुछ तो मिल ही जायेगा | ऐसा सोचकर वह राजा द्रुपद के राज्य में जा पहुंचे तथा उसे अपने बचपन में कहे हुए वचन याद दिलाये | पर तब तक द्रुपद बहुत बदल चूका था तथा वह ना सिर्फ अपनी बात से मुकर गया बल्कि उसने द्रोण को भिखारी बोलकर राज्य से बाहर निकलवा दिया |

इस घोर अपमान को द्रोण सहन नहीं कर सके तथा उन्होंने द्रुपद को सबक सिखाने का निर्णय लिया | कालान्तर में एक बार वन में भ्रमण करते हुए उन्होंने देखा की कौरव-पांडवों की गेंद तालाब में गिर गई। इसे देखकर द्रोणाचार्य का ने अपने धनुषर्विद्या की कुशलता से उसको बाहर निकाल लिया। इस अद्भुत प्रयोग के विषय में तथा द्रोण के समस्त विषयों मे प्रकाण्ड पण्डित होने के विषय में ज्ञात होने पर भीष्म पितामह ने उन्हें राजकुमारों के उच्च शिक्षा के नियुक्त कर राजाश्रय में ले लिया और वे द्रोणाचार्य के नाम से विख्यात हुये।

कौरवों तथा पांडवों की शिक्षा पूर्ण होने के बाद द्रोण ने गुरु दीक्षा में शिष्यों से द्रुपद का राज्य छीनकर उसे गिरफ्तार करके लाने के लिए कहा | इसमें पहले कौरव गए तथा परास्त हो गए परन्तु बाद में अर्जुन के नेतृत्व में पांडवों ने द्रुपद को गिरफ्तार कर के गुरु द्रोणाचार्य के चरणों में डाल दिया | द्रोणाचार्य ने अपना बदला पूरा किया तथा बचपन के वचन अनुसार आधा राज्य लेकर आधा वापस द्रुपद को देकर उसे छोड़ दिया | अब द्रुपद के मन में क्रोध और बदले की भावना जलने लगी |

द्रुपद ने द्रोणाचार्य से बदला लेने के लिए ‘पुत्रकामेष्टि’ यज्ञ किया तथा यज्ञ की अग्नि से जुड़वाँ पुत्र और पुत्री की प्राप्ति हुई जिनके नाम थे दृष्टाधुम्ना और द्रोपदी | महाभारत युद्ध में दृष्टाधुम्ना ने ही द्रोणाचार्य का सर काटा था और द्रोपदी वही स्त्री थी जिसका जन्म अर्जुन से विवाह तथा द्रोणाचार्य से बदला लेने के लिए हुआ था | अतः कर्ण को मछ्ली पर निशाना लगाने वाले स्वयंवर से अपमानित करके भगाने से लेकर इन्द्रप्रस्थ के माया महल में दुर्योधन के पानी में गिर जाने के बाद उसको ‘अंधे का पुत्र अँधा’ कहकर पुकारने के पीछे प्रयोजन शुद्र का अपमान या दुर्योधन का अपमान नहीं था | द्रोपदी को शुरू से पता था की उसका जन्म क्यों हुआ है तथा उसका लक्ष्य क्या है | उसके पिता ने यज्ञ से उसे अवतरित ही द्रोणाचार्य तथा उनकी सेना से बदला लेने के लिए किया था यह द्रोपदी को शुरू से ज्ञात था और उसने हर कदम इसी को ध्यान मे रखकर रखा तथा अंत मे सफल भी हुई |

जो नारी श्री कृष्ण को महाभारत में डांटने का साहस रखती हो , जो भीष्मपितामह की बाणों की मृत्युशैया पर युद्ध स्थल में सामने से हंसने का दुस्साहस कर सकती हो तथा अपने साडी खीचने वाले दुशासन के रक्त से अपने केशों को धोने की हिम्मत रखती हो वह कुछ भी हो सकती है पर अबला या कमजोर नारी तो कहीं से नहीं थी | वह यज्ञ अग्नि से उत्पन्न अवतार थी जिसका मूल लक्ष्य द्रोणाचार्य से अपने पिता के अपमान का बदला लेना था जो की उसने लिया भी तथा उसके लिए जो परिस्थितियां उत्पन्न करनी थी उसने की |

अतः पश्चिमी नारीवादियो तथा वामपंथियों का यह तर्क की द्रोपदी एक अबला नारी थी तथा वह भारत और हिन्दू धर्म की पित्रसत्तात्मक सोच का शिकार हुई थी | यह सरासर गलत तर्क है तथा इनके अधूरे और अज्ञान का परिचायक है | आगे से कोई भी भारत या हिन्दू धर्म या इतिहास के किसी ग्रन्थ या पात्र पर सवाल उठाये तो उससे हाथ जोड़कर यह पूछें की क्या आपने मूल ग्रन्थ पढ़ा है या किसी अंग्रेज या वामपंथी द्वारा रचित तथ्यहीन लेख या पुस्तक पढ़कर आप यह कुतर्क कर रहे हैं | यदि मूल ग्रन्थ ना पढ़ा हो तो उन्हें बताएं की पहले मूल ग्रन्थ किसी भारतीय गुरु के सानिध्य में बैठकर पढ़ें और सीखें | इसके बिना भारतीय इतिहास या ग्रन्थों को समझना अत्यंत कठिन है तथा कई बार लोग अपनी नासमझी के कारण अर्थ का अनर्थ कर देते हैं और इल्जाम बेचारी हिन्दू सभ्यता और भारतवर्ष को झेलना पड़ता है |

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